अनदेखी मेरी दुनिया
शनिवार, 25 सितंबर 2021
बहुत भीड़ है न लोगो की
पर मुझे महसूस नही हुई कभी
मैं कल भी था मैं आज भी हु
बस न कल कोई साथ था न
आज कोई है
हम अपनी परछाई से ही
कह लेते है हर बात
कोई और तो है नही
परछाई भी छोड़ जाती है साथ
मजबूरी है हर पल
दे नही सकती साथ मेरे
शिकायत किस्से करे
जब नाराजगी खुद से भी है
बहुत भीड़ है न लोगो की
पर मुझे महसूस नही हुई कभी
शब्बु ...✍🏻
घर मेरा जल रहा था
मैं बैठ के देख रहा था
बुझाउ क्यो ये सोच रहा था
जब मेहनत अपनो ने की थी
जलाने की ......
उन्हें रुलाऊ क्यो ये सोच रहा था
घर मेरा जल रहा था
दीपक पटेल ( शब्बु )✍🏻
शुक्रवार, 30 अगस्त 2019
आज कहा हु मैं
आज कहा हु मैं
ये तो मेरी मंजिल नही थी
न ये मेरे सपने थे
थोड़ा याद कर लूं
शायद याद हो मुझे
धुंधली सी याद है
कुछ ज्यादा सपने नही थे मेरे
यकीन न थी
जिंदगी इतनी लम्बी चलेगी
कुछ सपने थे जो उलझते हुए
पता नही कब और कहा खो गए
कुछ अपने भी मेरे हुआ करते थे
कुछ रिश्ते भी मेरे अपने थे
कुछ खुशिया भी मेरे लबो पे थे
कुछ धुंधला सा याद है
कुछ उमीदें भी मुझसे थी
कुछ उम्मीदों में खो गया
कुछ अपनो को सम्हाल कर
मैं खुद को बिखेर गया
वो सपने थे कि वो अपने थे
शायद सच थे या सपने थे
कुछ धुंधला सा याद है
आज कहा हु मैं
ये तो मेरी मंजिल नही थी
दीपक पटेल ( शब्बु ) ....✍
शुक्रवार, 16 नवंबर 2018
जिंदगी बड़ी लम्बी लगती है ना...
जिंदगी बड़ी लम्बी लगती है ना
पर कभी कभी
वक्त इतनी जल्दी गुजर जाता है
पता भी नही चलता ...
अजनबी से होते है सब
जब हम इस दुनिया मे आते है
ओर एक दिन अजनबी ही तो बन जाते है
जब हम इस दुनिया से चले जाते है
पर एक लंबा वक्त इस बीच
हमे मिलाती है अपनो से
कुछ मतलबी अपनो से ओर
कुछ जो अपने रहते है
पर अपने नही होते
ओर कुछ लगते तो है अपने है
पर एक चहरा छुपा होता है मतलब का
जिंगदी बड़ी लम्बी लगती है ना
पर होती नही ।
दीपक पटेल ( शब्बु )
✍
मैने फिर से ओढ़ी एक चादर
मैने फिर से ओढ़ी एक चादर
कोई सपना न आये
चैन से सोना है
कोई अपना न आये
सुकून ये तन्हाई में
कोई अपना न
बन जाये
सुकून नींद की
कोई छीन न
ले जाये
मैने फिर से ओढ़ी एक चादर
कोई सपना न आये
दीपक पटेल (शब्बु )
✍
बुधवार, 29 अगस्त 2018
ये हवावो की साजिश
ये हवावो की साजिश थी
या किस्मत की लकीरों में था
मंजिले कही और
मैं चला कही और
हकीकत बया करती
सफर बेगानी सी
चलना भी अकेले है
और राही भी मैं अकेला हु
ठोकरे तो मिलनी ही थी
और सम्हलना भी खुद ही था
उम्मीद बस खुद से थी
करीब कोई अपना न था
ये हवावो की साजिश थी
या किस्मत की लकीरों में था
दीपक पटेल ( शब्बु )... ✍
मंगलवार, 28 अगस्त 2018
अजनबी
अजनबी -
कोंन है ये अजनबी
वो जो अपने थे
पर किसी ने अपना न कहा
कोंन है ये अजनबी
जो मतलबो के भवर में
फसा के रखते थे
वे अपने थे
समंदर में इतनी तूफान ही नही आई
जो मेरी कस्ती डूबा सके
अपनो ने दो छेद क्या किये
मेरी कस्ती जो डूबी जो कि किनारे पे थी
कोंन है ये अजनबी...
दीपक पटेल ( शब्बु ) ✍
ये उन दिनों की बात है
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
सच्चे और अच्छे हुआ करते थे
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
हस्ते रोते अपने मे मस्त रहते
न कोई फिकर न परेशानिया होती थी
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
होठो पे मुस्कान लबो पे हँसी होती थी
रूठना ओर मनाना पल पल में होता था
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे ।।
दीपक पटेल (शब्बु) ___ ✍
मैं चांद तारे तोड़ने की बात नही करता
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
लोग कहते है
चार दिनों की है जिंदगी
बस इन चार दिनों में
दो चार कदम चलने के लिए
साथ चाहिए तुम्हारा
जब मैं थक जाऊ
तुम थाम लेना
जब तुम थक जावोगी
मैं थाम लूंगा
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
दो चार कदम चलने के लिए
साथ चाहिए तुम्हारा
__दीपक पटेल ( शब्बु ) ✍
गुरुवार, 1 मार्च 2018
नादान हु
आता नही मुझे बहलाना किसी को
आता नही मुझे दिलो को जितना
छोटी सी जिंदगानी मेरी
गलतियों के समुंदर से भरा
बहुत कुछ सीखा मैंने
अब तक के सफर में
फिर भी हो जाती है गलतिया नादान जो हु
अब भी सिख रहा खुद को बेहतर कर रहा
मुझे मेरी गलतिया बता दिया करो
किसी को दिखे तो जरा
आपकी अच्छाई मुझे भी मिल जाये जरा
मैं भी आप अच्छे लोगो जैसा बन जाऊ जरा
दीपक पटेल ( शब्बु )__✍
शुक्रवार, 24 नवंबर 2017
भूल गये थे
हम तो भूल गये थे ,
लिखना नही है कुछ ,
कुफ़्तगु ये जिक्र उनके लिये ,
पसंद नही उन्हें जिक्र ये खुशबू आये ,
कविता में कही ,
यू खयाल चल रही थी ,
जहन में मेरे ,
यू सुरुवात से अंत तक क्या खता थी मेरी ,
सवाल क्या करे गम तो उन्हें भी होगा ,
दिमाक से समझाते होंगे वो सही है ,
पर दिल को कब तक बहला पाएंगे,
यू खत्म न होगी सफर ये जिंदगी हमारी ,
हम याद बन के रह जाएंगे ,
होंगे जरूर हमसे बेहतर जमाने मे बहुत ,
पर मुझ जैसा ढूंढ पाएंगे कैसे ।।
दीपक पटेल ( शब्बु ) ✍
मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017
मन बावरा कुछ सोचे न
मन बावरा कुछ सोचे न
जो आये वो ही कहने लगे
मन बावरा कुछ सोचे न
मुस्कुराते चहरे के साथ
कुछ यादों में बस जाती
मन बावरा कुछ सोचे न
मन के अंधेरी दुनिया मे
एक खुश्बू सी आने लगी है
बंजर दुनिया मे खुश्बू छाने लगी है
मन बावरा कुछ सोचे न
सोच में ही डूबी दुनिया इसमे
न पा के भी सब कुछ पा लेना
डर नही कुछ खोने का
यहा खुश्बू अपनी है जो मन मे बसती
मन बावरा कुछ सोचे न
दीपक शब्बु पटेल ✍
गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017
रूठ के कुछ कदम आगे हम चल पड़े
रूठ के कुछ कदम आगे हम चल पड़े
ये उम्मीद थी आवोगे तुम पीछे सनम
मुड़ कर देखा न गया
कही दिल न टूट जाये ये डर भी था।
रूठ के कुछ कदम आगे हम चल पड़े
कर रहे थे इंतजार हम सनम
न तुम आई न कोई संदेश तुम्हारा
रात कैसे कटी तुमको हम क्या कहे
खुद को कोसते हुए करवटे बदलते रहे ,
रूठ के कुछ कदम आगे हम चल पड़े
हम ने माना कि तुम अब हमारे न रहे
यू रूठ जावोगी तुम हमने सोचा न था
याद उन बातों को हम अब कर रहे
जिनमे तुमने वादे किये थे अब वो झूठे लग रहे
क्या कहु तुमको अब तुम जो अब हमारे न रहे
रूठ के कुछ कदम आगे हम चल पड़े।।
दीपक पटेल (शब्बु)
बुधवार, 27 सितंबर 2017
मासूम बच्चे की दासता
मासूम बच्चे की दासता
मैं आया नहीं लाया गया था ,
मैं रोया नहीं रुलाया गया था,
वही से मेरी पहचान बतलाया गया था।
मुझे जो दिखाया गया मैं वही देखता था ,
मुझे जो सुनाया गया मैं वही सुनता था,
मुझे जो बोला गया वाही बोलता था।
दुनिया को देखा जैसे दिखाया गया था,
मैं आया नहीं लाया गया था ।
न रिश्तो की समझ थी न अपनों की पहचान ,
जो मुझे सिखाया गया मैं वही सीखता गया,
मैं आया नहीं लाया गया था।
ये दुनिया तो वैसी नहीं जैसा दिखाया गया था ,
जरूरत ही यहाँ सब कुछ है जरुरत नहीं तो कुछ भी नहीं।
मैं आया नहीं लाया गया था।
मुखावटे लगे अपनों के पीछे चालाकी को समझ पाउ कैसे,
कोई सिखला दे मुझे इन सबसे सम्हल पाउ मैं कैसे।
मैं आया नहीं मुझे लाया गया था।
वो माँ की लोरी वो पिता का प्यार ,
बस याद ही रह जाते है बड़े होने के बाद।
मैं आया नहीं लाया गया था फिर क्यों मुझे भुलाया गया था ।
मैं आया नहीं लाया गया था ।
दीपक पटेल
अजीब मोहब्बत
अजीब मोहब्बत
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
जबसे तुम्हे सोचा तुम्हारा ही हुआ ,
फिर भी मैं तुमसे दूर रहा ।
अपनी दर्द मैं कैसे कहु,
किस्मत से मिली हो तुम,
फिर भी किस्मत में नहीं तुम।
खुद को उस लायक कैसे बनाऊ,
जिससे तुमको अपना बना लू ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
खुद को सोचता हु फिर तुम्हे ,
क्या इतनी मोहब्बत मैने की थी ,
की तुमको परेसान करू,
तुम्हारे मोहब्बत के लायक भी तो मैं नहीं ।
अपनी तनहाइयों में तुम्हे सामिल कैसे करूँ,
इतनी खुदगर्ज मोहब्बत मैने ना की थी।
तुमको भुला दू वो तरीका बता दो,
की मैं तुमसे दूर चला जाऊ ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
न हो मुझसे कोई ऐसी खता ,
की तुम को तकलीफ हो मेरे खुदा ।
अपनी मोहब्बत रूहो की इबादत ,
जिस्म को तो एक दिन मिट जाना है।
तुमसे मोहब्बत बेइंतहा हम करते ,
अगर वो किस्मत हमें मिलता।
फिर भी मैं खुस हु ,
तुम्हारी यादो में मैं जो हु ।
चाह सको तो भुला दो मुझे ,
उसका गम मुझे नहीं ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
दीपक पटेल (शब्बु)
deepaksabbu@gmail.com
सोमवार, 18 सितंबर 2017
मैं हु कोन
मैं हु कोन कोई न जान सका ,
मैं चाहू क्या कोई न पहचान सका ।
कोई साथ रहा अपने ही मतलब से रहा,
वो जाना ही नही मैंने क्या चाहा,
अपनो के साथ भी परायो सा लगता है ,
क्या कहु ओर किसे कोई अपना ही नही मिलता है ,
डर है मुझे इन लोगो के भीड़ से ,
कोई हस्ता है कोई रुलाता है
किसी को मेरी परवाह नही ,
बंद अंधेरे कमरे में मैं
खुद से बाते करता हु ,
एक खूबसूरत दुनिया मेरी हर पल खयालो में बसाता हु ,
कोई न जाने मुझे न कोई समझे मैं खुद से बाते करता हु ।
दीपल पटेल (शब्बु) ✍
एक ख़्वाब था उसका
एक ख़्वाब था उसका अंधेरी रात में साथ हो किसी का, चांदनी रात हो और उसके पास भी वो चांद सी हो,
एक ख़्वाब था उसका कोई थाम ले हाथ चाहे कुछ पल के लिए ,
एक ख़्वाब था उसका
सुनहरी धूप हो जहा उसके जुल्फों के छाव तले उसकी गोदी में सर हो अपना ,
एक ख़्वाब था उसका कोई साथ हो जैसे रूह के बंधन बंधे हो हर सांसो की तरह ,
एक ख़्वाब था उसका जो कभी पूरा न हुआ वो चला गया अपने ख़्वाब हो पूरा करने कभी न उठने वाले नींद की आगोस में सोने वो चला गया ।
रविवार, 17 सितंबर 2017
तुम कोन थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
भीड़ में रह के भी अकेला था ,
तुम एक सपने की तरह आई और खो गई ,
कहा ढूंढता तुम्हे ,
न मंजिल का पता था न तुम्हारा।
बस एक उम्मीद थी
तुम्हारे लौट आने की
बस एक उम्मीद थी तुम्हे चाहने की ।
तुम कोन थी क्या थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
कुसूर क्या था मेरा तुमने अपना न समझा ,
फिर भी तुमसे मोहब्बत थी मेरी ।
मत पूछो उन पलों को
मत पूछो उन दर्द को
मत पूछो बिना रोये बहते उन अंसुवो को
मत पूछो न ढूंढ पाने की बेइंतहा तड़प को ।
तुम कोन थी क्या थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
नादान था न मैं नादानी हो गई
एक अजनबी से मोहब्बत हो गई ,
पर आज मैं बहुत खुश हूं
मेरी मोहब्बत को देख तो पाया
भले ही उसे न पा सकू
पर उसे जान तो पाया,
खुसी भी थोड़ा दर्द दे गई
जब उसने कहा
न मैं कल तुम्हारी थी न आज हु न होउंगी कभी ,
मुस्कुरा के मैंने दर्द छुपा ही रहा था ,
उसने कहा मुझे मोहब्बत है पर किसी ओर से
मत पूछो आलम मेरे दिल का
सीने से निकाल ले कोई
तो भी न समेत पायेगा
इतने टुकड़े हुए
कोई देख के तड़प जाएगा ,
फिर भी समहाला खुद को
जब देखा उसके चेहरे में उदासी है
उसके दिल मे दर्द है
यही तो मोहब्बत है
दर्द जब उसे होता है तब अपना दर्द भी मीठा लगता है ।
उसकी चाहत मुझे उसे पाने की नही उसे हँसाने की है ,
भीड़ में गुम होने से पहले उसके दिल ❤मे बस जाने की है ।
दीपक पटेल ( शब्बू)