रविवार, 17 सितंबर 2017

तुम कोन थी

तुम कोन थी क्या थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
भीड़ में रह के भी अकेला था ,
तुम एक सपने की तरह आई और खो गई ,
कहा ढूंढता तुम्हे ,
न मंजिल का पता था न तुम्हारा।
बस एक उम्मीद थी
तुम्हारे लौट आने की
बस एक उम्मीद थी तुम्हे चाहने की ।
तुम कोन थी क्या थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
कुसूर क्या था मेरा तुमने अपना न समझा ,
फिर भी तुमसे मोहब्बत थी मेरी ।
मत पूछो उन पलों को
मत पूछो उन दर्द को
मत पूछो बिना रोये बहते उन अंसुवो को
मत पूछो न ढूंढ पाने की बेइंतहा तड़प को ।
तुम कोन थी क्या थी
मेरे लिए अंधेरी दुनिया मे मेरी अपनी थी ।
नादान था न मैं नादानी हो गई
एक अजनबी से मोहब्बत हो गई ,
पर आज मैं बहुत खुश हूं
मेरी मोहब्बत को देख तो पाया
भले ही उसे न पा सकू
पर उसे जान तो पाया,
खुसी भी थोड़ा दर्द दे गई
जब उसने कहा
न मैं कल तुम्हारी थी न आज हु न होउंगी कभी ,
मुस्कुरा के मैंने दर्द छुपा ही रहा था ,
उसने कहा मुझे मोहब्बत है पर किसी ओर से
मत पूछो आलम मेरे दिल का
सीने से निकाल ले कोई
तो भी न समेत पायेगा
इतने टुकड़े हुए
कोई देख के तड़प जाएगा ,
फिर भी समहाला खुद को
जब देखा उसके चेहरे में उदासी है
उसके दिल मे दर्द है
यही तो मोहब्बत है
दर्द जब उसे होता है तब अपना दर्द भी मीठा लगता है ।
उसकी चाहत मुझे उसे पाने की नही उसे हँसाने की है ,
भीड़ में गुम होने से पहले उसके दिल ❤मे बस जाने की है ।



दीपक पटेल ( शब्बू)

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