बुधवार, 27 सितंबर 2017

अजीब मोहब्बत

अजीब मोहब्बत
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
जबसे तुम्हे सोचा  तुम्हारा ही हुआ ,
फिर भी मैं तुमसे दूर रहा ।
अपनी दर्द मैं कैसे कहु,
किस्मत से मिली हो तुम,
फिर भी किस्मत में नहीं तुम।
खुद को उस लायक कैसे बनाऊ,
जिससे तुमको अपना बना लू ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
खुद को सोचता हु फिर तुम्हे ,
क्या इतनी मोहब्बत मैने की थी ,
की  तुमको परेसान करू,
तुम्हारे मोहब्बत के लायक भी तो मैं नहीं ।
अपनी तनहाइयों में तुम्हे सामिल कैसे करूँ,
इतनी खुदगर्ज मोहब्बत मैने ना की थी।
तुमको भुला दू वो तरीका बता दो,
की मैं तुमसे दूर चला जाऊ ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
न हो मुझसे कोई ऐसी खता ,
की  तुम को तकलीफ हो मेरे खुदा ।
अपनी मोहब्बत रूहो की इबादत ,
जिस्म को तो एक दिन मिट जाना है।
तुमसे मोहब्बत बेइंतहा हम करते ,
अगर वो किस्मत हमें मिलता।
फिर भी मैं खुस हु ,
तुम्हारी यादो में मैं जो हु
चाह सको तो भुला दो मुझे ,
उसका गम मुझे नहीं ।
तुमसे मोहब्बत भी मैं करू ,
तुम्ही से बगावत भी मैं करू ।
दीपक पटेल (शब्बु)
deepaksabbu@gmail.com

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