ये हवावो की साजिश थी
या किस्मत की लकीरों में था
मंजिले कही और
मैं चला कही और
हकीकत बया करती
सफर बेगानी सी
चलना भी अकेले है
और राही भी मैं अकेला हु
ठोकरे तो मिलनी ही थी
और सम्हलना भी खुद ही था
उम्मीद बस खुद से थी
करीब कोई अपना न था
ये हवावो की साजिश थी
या किस्मत की लकीरों में था
दीपक पटेल ( शब्बु )... ✍
बुधवार, 29 अगस्त 2018
ये हवावो की साजिश
मंगलवार, 28 अगस्त 2018
अजनबी
अजनबी -
कोंन है ये अजनबी
वो जो अपने थे
पर किसी ने अपना न कहा
कोंन है ये अजनबी
जो मतलबो के भवर में
फसा के रखते थे
वे अपने थे
समंदर में इतनी तूफान ही नही आई
जो मेरी कस्ती डूबा सके
अपनो ने दो छेद क्या किये
मेरी कस्ती जो डूबी जो कि किनारे पे थी
कोंन है ये अजनबी...
दीपक पटेल ( शब्बु ) ✍
ये उन दिनों की बात है
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
सच्चे और अच्छे हुआ करते थे
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
हस्ते रोते अपने मे मस्त रहते
न कोई फिकर न परेशानिया होती थी
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे
होठो पे मुस्कान लबो पे हँसी होती थी
रूठना ओर मनाना पल पल में होता था
ये उन दिनों की बात है
जब हम बच्चे हुआ करते थे ।।
दीपक पटेल (शब्बु) ___ ✍
मैं चांद तारे तोड़ने की बात नही करता
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
लोग कहते है
चार दिनों की है जिंदगी
बस इन चार दिनों में
दो चार कदम चलने के लिए
साथ चाहिए तुम्हारा
जब मैं थक जाऊ
तुम थाम लेना
जब तुम थक जावोगी
मैं थाम लूंगा
मैं चांद तारे तोड़ने की
बात नही करता
दो चार कदम चलने के लिए
साथ चाहिए तुम्हारा
__दीपक पटेल ( शब्बु ) ✍