सोमवार, 18 सितंबर 2017

मैं हु कोन

मैं हु कोन कोई न जान सका ,
मैं चाहू क्या कोई न पहचान सका ।
कोई साथ रहा अपने ही मतलब से रहा,
वो जाना ही नही मैंने क्या चाहा,
अपनो के साथ भी परायो सा लगता है ,
क्या कहु ओर किसे कोई अपना ही नही मिलता है ,
डर है मुझे इन लोगो के भीड़ से ,
कोई हस्ता है कोई रुलाता है
किसी को मेरी परवाह नही ,
बंद अंधेरे कमरे में मैं
खुद से बाते करता हु ,
एक खूबसूरत दुनिया मेरी हर पल खयालो में बसाता हु ,
कोई न जाने मुझे न कोई समझे मैं खुद से बाते करता हु ।
दीपल पटेल (शब्बु) ✍

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