मैने फिर से ओढ़ी एक चादर
कोई सपना न आये
चैन से सोना है
कोई अपना न आये
सुकून ये तन्हाई में
कोई अपना न
बन जाये
सुकून नींद की
कोई छीन न
ले जाये
दीपक पटेल (शब्बु )
✍
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें